मनुष्य के दिमाग पर पड़ता है गरीबी का असर

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वाशिंगटन । शोधकर्ताओं की माने तो गरीबी से व्यक्ति की जीवनशैली के अलावा उसके दिमाग पर भी प्रभाव पड़ता है।गरीबी के कारण मस्तिष्क के विकास पर भी असर होता है। स्कूल शिक्षक की माने तो गरीबी में पलने वाले बच्चों का परीक्षा में प्रदर्शन अच्छा नही रहा है। जबकि खाते-पीते घरों के बच्चे अच्छे अंक हासिल करते हैं। अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक एल्डर शफ़ीर ने स्कार्सिटी (दुर्लभता) नाम से एक ]िकताब भी लिखी है। इस किताब में उन्होंने पैसे और वक्त की कमी के इंसान की ज़िंदगी पर असर के बारे में बताया गया है। वह मानते है कि पैसे की कमी यानी गरीबी हमारी सोच को कमजोर करती है। गरीबी की वजह से हमारे सोचने-समझने की त़ाकत कमज़ोर होती है। उन्होने कहा कि यदि आप किसी को सात नंबर बताएं और उनसे कहें कि इसी क्रम में याद रखें और बाद में बताएं, तो लोगों को इसमें भी दिक़्क़त होती है। आप इनका क्रम भूल जाएंगे। उनके पास कम संसाधन होते हैं। तो लोग अक्सर दुनियावी उलझनों में ही फंसे रहते हैं। मसलन बच्चों की फ़ीस कैसे भरनी है? घर का ख़र्च कैसे चलाना है? बीमारी की सूरत में इलाज के लिए पैसे कहां से आएंगे? त्यौहार कैसे मनाएंगे? लगातार इन सवालों में उलझे रहने वाले लोग दूसरी ज़्यादा अक़्लमंदी की बातें नहीं सोच पाते। एल्डर शफ़ीर कहते हैं कि अगर दिमाग़ दुनियावी बातों में उलझा रहता है, तो ब़ाकी चीज़ें सोच ही नहीं पाता।

यदि आपकी जेब में ज़्यादा पैसे हैं। तो, आप तमाम मुश्किलों का हल आसानी से निकाल सकते हैं। वरना आपका दिमाग़ उलझा ही रहेगा। शफ़ीर के मुताब़िक सिर्फ़ पैसे की वजह से लोगों के आईक्यू में 12-13 अंकों का अंतर देखा गया। शफ़ीर का मानना है कि फ़सल कटने के बाद किसान धनी होते हैं। उनकी जेब में पैसे होते हैं। उनमें आत्मविश्वास होता है। इसका सीधा असर उनके चुनौतियों का सामना करने की त़ाकत पर पड़ता। वहीं फ़सल तैयार होने से पहले के दो महीने किसानों के लिए मुश्किल भरे होते हैं। इसलिए वो बाकी चीज़ों के फ़िक्र में ही फंसे रहते हैं। नई चुनौतियों का हल नहीं सोच पाते। फ़सल कटने और उससे पहले के वक़्त में किसानों के आईक्यू लेवल में 9 प्वाइंट तक का फ़र्क आया था। केटी अमरीका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर केटी मैक्लॉक्लिन रोमानिया के अनाथालय में पल रहे बच्चों पर शोध कर रही हैं। केटी कहती हैं कि दिमाग़ का सबसे ज़्यादा विकास बचपन में ही होता है। इसीलिए वो बच्चों पर रिसर्च कर रही हैं। रोमानिया के अनाथालयों की हालत बेहद ख़राब है। बच्चे ख़ुरदरी बंज़र दीवारो के बीच क़ैद से हैं। उनके पास खिलौने भी कम हैं। ऐसे माहौल में तो बच्चों का दिमाग़ कम ही विकसित होगा। लेकिन केटी कहती हैं कि बेहद अभाव में पलने वाले दूसरे बच्चों की भी उन्होंने पड़ताल की है।

उन्होंने पाया है कि अगर अनाथालय में रह रहे बच्चों को अमीरों ने गोद ले लिया है। या उन्हें बेहतर जगह भेज दिया गया। उनकी अच्छी परवरिश हुई, तो, ऐसे बच्चों का दिमाग़ आम बच्चों जैसा ही पूरी तरह से विकसित हुआ। उनका आईक्यू लेवल ज़्यादा अच्छा देखा गया लेकिन जो बच्चे लगातार ग़ुरबत में पलते रहे, उनका दिमाग़ पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ। साफ़ है कि परवरिश के माहौल का बच्चों पर गहरा असर पड़ा था।

ऐसा केटी को सिर्फ़ रोमानिया के अनाथालय के बच्चों में देखने को नहीं मिला। अमरीका में भी ग़रीबी में पल रहे बच्चों का दिमाग़ भी ऐसे ही सूखता हुआ सा देखा गया। बचपन में जिन बच्चों से ज़्यादा बात करने वाले लोग नहीं थे। जिनके पास खिलौने कम थे। जिन्हें खेलने का म़ौका कम मिला, उनके दिमाग़ की कई तंत्रिकाएं सूख गईं। उनका आईक्यू लेवल (बौद्धिक स्तर) कम रह गया। बच्चों के दिमाग़ का विकास उम्र के दूसरे साल से बड़ी तेज़ी से होता है। उस वक़्त से ही उसकी परवरिश पर ध्यान देने की ज़रूरत है। तभी उसका दिमाग़ ठीक से विकसित होगा। वरना अक़्ल की रेस में बच्चा पीछे रह जाएगा। ऐसे बच्चे आगे चलकर मुश्किल ज़िंदगी जीते हैं। वो तरक़्क़ी नहीं कर पाते।