भ्रूण लिंग परीक्षण करने बनाए साफ्टवेयर का नहीं हो रहा उपयोग

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1 लाख 80 हजार रुपए में बना है साफ्टवेयर  | भोपाल। सीमएचओ ऑफिस भोपाल में लगाया गया प्रदेश का पहला साफ्टवेयर सिर्फ ‘एफ’ फार्म भरने के काम आ रहा है। यह साफ्टवेयर भ्रूण लिंग परीक्षण और कन्या भूण हत्या रोकने के मकसद से बनवाया गया था, जिसका लागत
करीब 1 लाख 80 हजार रुपए आई थी।साफ्टवेयर के सही उपयोग नहीं होने से संदिग्ध मामलों की ट्रेसिंग नहीं हो पा रही है। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने शुरू में दावा किया था एफ फार्म भरने के बाद इनमें संदिग्ध मामलों को साफ्टवेयर ट्रेस कर लेगा। यह साफ्टवेयर एक निजी एजेंसी से बनवाया गया था। करीब तीन साल पहले भोपाल के तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. पंकज शुक्ला के समय में यह साफ्टवेयर बनवाया गया था। इसमें ऐसे फीचर भी थे कि भ्रूण लिंग पता करने के मकसद से सोनोग्राफी कराने वाली महिलाओं को ट्रेस किया जा सके। ऐसी महिलाओं को साफ्टवेयर में रेड पट्टी में दिखाया जाना था। ऐसे मामलों की टीम बनाकर जांच की जानी थी, लेकिन इस मकसद से इस साफ्टवेयर का उपयोग नहीं हो पा रहा है। साफ्टवेयर में ऑनलाइन या ऑफलाइन एफ फार्म की एंट्री की जा रही है।
       सूत्रों के मुताबिक, एफ फार्म वह होता है जिसे गर्भवती महिला की सोनोग्राफी के दौरान भरा जाता है। इसमें महिला का नाम, पता, उम्र, पहले से कितन बेटे-बेटियां हैं, सोनोग्राफी के लिए रेफर करने वाले डॉक्टर का नाम, गर्भावस्था का महीना लिखा जाता है। संचालकों को लॉगिन पासवर्ड दिए गए हैं। इसी तरह कागज में आने वाले एफ फार्म की आफलाइन एंट्री सीएमएचओ ऑफिस में की जा रही है। इस संबंध में गर्भधारण पूर्व व प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम (पीसी एंड पीएनडीटी) की जिला सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. शैलेष लूनावत का कहना है कि साफ्टवेयर से संदिग्धों की पहचान कर हमेशा जांच की जाती है। इस बारे में पीसी एंड पीएनडीटी के नोडल ऑफिसर ड़ॉ वीके चौधरी का कहना है कि साफ्टवेयर में खुद संदिग्धों की पहचान नहीं होती, लेकिन संदिग्ध महिलाओं के नाम एफ फार्म से निकाले जाते हैं। इसके बाद उनके पते पर जाकर जांच भी की जाती है। ऐसी महिलाओं पर विशेष फोकस रहता है, जिनकी डिलीवरी की सूचना नहीं मिलती ।