बच्चों के लिए पढ़ाई को रूचिकर बनाएं 

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बच्चों की सीखने की क्षमता बहुत तेज होती है। एक ताजा शोध के मुताबिक तीन साल से कम आयु के बच्चों में बड़ी तेज़ी से मानसिक विकास होता है। माता-पिता के दैनिक कार्य जैसे पढ़ना, गाना और उनसे लाड़-प्यार करना, ये सारे काम बच्चों के अच्छी तरह से विकास एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। एक शोध के अनुसार दो से आठ साल की आयु के बच्चों के माता-पिता में से सिर्फ आधे ही अपने बच्चों को रोज़ पढ़कर सुनाते हैं। आप शायद सोच सकते हैं, ‘क्या पढ़कर सुनाने से वाकई मेरे बच्चे पर कोई गहरा असर होता है?’

-नज़दीकी रिश्ता बनाना ,बढ़ती उम्र के बच्चों में ऐसी आदतें विकसित होती हैं जो आगे चलकर उनकी ज़िंदगी पर असर करता है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों में एक करीबी रिश्ते की बुनियाद डालें जिसमें विश्वास, आपस में आदर और एक-दूसरे को समझने की भावना हो। ऐसा करने के लिए पढ़ना मददगार साबित हो सकता है। जब माता-पिता अपने बच्चों को अपनी बाँहों में लेकर, उन्हें पढ़कर सुनाते हैं तो उनका यह तरीका एकदम साफ सुनायी देता है। ऐसी हीं एक माँ, अपने आठ साल बेटे को पढ़कर सुनाने के बारे में कहती है कि “मैं और मेरे पति मानते हैं कि इसी वजह से हमारा बेटा हमारे बहुत करीब महसूस करता है।

वह हमसे कुछ नहीं छिपाता और अकसर अपने दिल की बात कहता है। इस तरह हमारे बीच एक बहुत ही खास बंधन बन गया है। एक अन्य मां ने कहा कि जब उनकी बेटी करीब एक साल की हुई, तब वह बैठना सीख रही थी और एक-दो मिनट के लिए सुनकर समझ सकती थी। उन्होंने उसी उम्र में उसे पढ़कर सुनाने की आदत बना ली। क्या इतनी मेहनत और समय बिताने का कोई फायदा हुआ है? उन्होंने कहा कि स्कूल में हुई कुछ घटना या उसकी सहेलियों के साथ हुए झगड़ों के बारे में जानने के लिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। दोस्तों की तरह बस उसके साथ शांत माहौल में किताब पढ़ना ही काफी होता है। साथ ही यह तय है कि ज़ोर से पढ़कर सुनाने से माता-पिता और बच्चे के बीच एक करीबी रिश्ता बन सकता है।