प्ले प्री-स्कूल बना कारोबार

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बदलते शिक्षा के प्रतिमानों के कारण तीन से छह साल तक के बच्चों के लिए प्ले या प्री-स्कूल की व्यवस्था प्रचलित हुई थी, जिसमें इतने छोटे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई न होकर उनके खेलने-कूदने एवं मानसिक विकास के लिए उनसे तरह-तरह के उद्यम करवाए जाते थे। लेकिन देखने में आ रहा है कि प्ले एवं प्री स्कूलों के लिए भी बाकायदा पाठयक्रम बन गए हैं और इसके बढ़ते दायरे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि पिछले कुछ सालों के भीतर इसने एक बड़े कारोबार का रूप ले लिया है। न केवल भव्य एवं आलीशान प्ले एवं प्री स्कूल बन गए हैं, बल्कि उनके पाठयक्रम भी आकर्षक एवं खर्चीले बनने लगे हैं। फीस के नाम पर मोटी रकम की वसूली से लेकर बच्चों के साथ बर्ताव तक के मामले में अक्सर कई तरह गड़बड़ियां सामने आती रही हैं। इसके अलावा, कई जगहों पर

बचपन न छीनें
सिर्फ एक कमरे या किसी बेसमेंट तक में ऐसे स्कूल चलाए जाते हैं। क्या वास्तव में हम बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं। आधुनिकता और विलासिता की चकाचौंध में बच्चों को कच्ची उम्र से ही अपने अनुसार ढालने की प्रक्रिया और टीवी, मोबाइल, कम्प्यूटर जैसे आधुनिक माध्यमों के प्रभाव के चलते बचपन कहीं गुम होता जा रहा है। हम अपने बच्चों को एक रोबोट जैसा बनाते जा रहे हैं, जिसका रिमोट हमारे हाथ में होता है। कहीं यही कारण तो नहीं हैं कि कच्ची उम्र से ही आत्महत्या करने की भावना जन्म लेने लगी है। ये वह दौर है, जब हर तरह के सर्वे हो रहे हैं, अध्ययन हो रहे हैं, शोध हो रहे हैं, लेकिन कोई शोध इस बचपन के बोझ को कम करने के लिए हो रहा है क्या? क्या ऐसा नहीं लग रहा कि बचपन को हमने बहुराष्ट्रीय कंपनियों और धन-दौलत के लालची व्यापारियों के हाथों में सौंप दिया है? विकास और आधुनिकता के नाम पर हमारे चारों ओर जो घेरा बन गया है, वह एक चक्रव्यूह की तरह हो गया है और हम अभिमन्यु की भांति इसमें प्रवेश तो कर गए हैं, परंतु बाहर निकलने का रास्ता हमारे पास नहीं है। कोई अर्जुन या कृष्ण भी हमारे पास नहीं है, जो हमारा मार्ग प्रशस्त कर सके। यहां मुद्दा हमारी बाल पीढ़ी का है, जो बेहद संवेदनशील है।